Thursday, September 25, 2025

तुम कभी बैठो अकेले

तुम कभी बैठो अकेले यादों के संग,
चाय की कप में तैरती पुरानी उम्मीदें,
किसी पुरानी गली की खुशबू, सामने खिड़की पर बरसात की रौशनी।
बेतरह ख़ामोशियाँ बोल उठती हैं तब, गुनगुनाती पलकों पर गीत।
दिल का पटख़ाना धीरे-धीरे खुलता है—कुछ बातें बताने को, कुछ चुप रहने को।
रख लो उन्हें छोटे डिब्बों में, कभी-कभी खोलकर हँसो, कभी-कभी रो लो।

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